बंगाल से छत्तीसगढ तक: कैसे माओवादी ने हर जगह राज किया है

माओवादी का छत्तीसगढ में जवानों पर हुए  हमले किसी से छुपा नही है और यह भी कोई नयी बात नही है यह Maoist हमले तो आए दिन होते रहते है। सन् 2000 के दशक में देश के 200 राज्यों मे माओवादियों ने कब्जा कर रखा था और धीरे धीरे यह कम होकर 30 राज्यों तक सीमित रह गये है। मध्य प्रदेश एवं तेलंगना ने इन पर जीत हासिल कर ली है, लेकिन आज के समय में तो Maoist ने छत्तीसगढ को अपना गढ बना लिया है। इतना ही नहीं ये झारखण्ड के कुछ इलाको में भी सक्रिय है और इन पर जीत हासिल करना अब मुश्किल होता जा रहा है।

कौन है ये माओवादी (Who is Maoist) ?

माओवादी एक militant organization है जो आज के समय में भी भारत में काफी सक्रिय रुप से रह रहे है। इनका लक्ष्य सशस्त्र विद्रोह,  mass mobilization, रणनीतिक गठजोङ से सरकार को गद्दी से हटा कर स्वंय देश में राज करना है। माओवादी या नक्सल शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग के छोटे से गाँव नक्सलबाङी से हुई थी जहाँ 1967 में नक्सलबाङी विद्रोह हुआ था जिसके प्रमुख नेता कानू संयाल एवं चारु मजुम्दार थे।

माओवादियों ने 1967 में सरकार के खिलाफ एक सशस्त्र आन्देलन की शुरूआत की थी। इन्होनें नक्सलबाङी से ही पहली बार भूमि अधिग्रहण को लेकर सरकार के खिलाफ आवाज उठायी थी। इनके इसी विद्रोह के कारण 1977 में बंगाल में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई और कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी सरकार बनाई जिसके मुख्यमंत्री ज्योति बसु थे। धीरे धीरे इनका वर्चस्व बढने लगा और ये अपने मुद्दों से भटक गये। यह आन्दोलन फैलता हुआ बिहार तक पहुँच गया लेकिन तब तक ये अपने मार्ग से पूरी तरह से भटक चुके थे। माओवादीयों का आन्दोलन भूमि की लङाई न रह कर जातीय वर्ग की लङाई बनने लगी और उच्च एवं मध्यम वर्गीय के बीच आन्दोलन छिङने लगा और धीरे-धीरे यह हिंसक रुप लेता चला गया।

अपने वित्त-पोषण के लिए माओवादी मुख्यतः खनन उद्योगों को अपना target बनाते है और कम्पनियों से लाभ का 3%-4% वसूलते है। अपनी सेना में भर्ती के लिए ये नौजवान युवाओं को अपना target बनाते है। इसके अलावा ये ड्रग्स का व्यापार भी चलाते है और इनकी आमदनी का आधा पैसे ड्रग्स के व्यापार से ही आता है।

किन किन राज्यों को माओवादी ने अपना गढ बनाया है

बंगाल

बंगाल में इनकी शुरूआत 1967 मे ही हो गयी थी लेकिन उस समय माओवादी ज्यादा सक्रिय नहीं थे। लेकिन 2000 के दशक ये कुल 18 राज्यों में सक्रिय हो गये थे। माओवादी बंगाल मे इतने हावी हो चुके थे की सरकार भी इन्हें अपने control में नही कर पा रही थी। 2010 में बंगाल में लगभग 300 से ज्यादा incidents हुए जिसमे 250 से ज्यादा लोग मारे गये थे। बंगाल मे 2011 में ममता बनर्जी के सरकार आने के बाद बंगाल पुलिस ने नकसली नेता किसनजी की हत्या कर माओवादी से बंगाल को छुटकारा दिलाया।

उङिसा

उङिसा मे इसकी शुरूआत 1990 के दशक हुई थी जहाँ माओवादीयों ने 30 में से 22 districts को अपने अन्दर कर लिया। 2008 में माओवादीयों ने नयागढ शस्त्रशाला को घुसकर रायफल, बंदुकें एवं AK-47 लुट लिया और कई पुलिसकर्मीयों को मार गिराया। इसके बाद 2008 में भी हमले किये गए जिसमें 100 से भी ज्यादा लोग मारे गये।

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र में भी इसकी शुरूआत 1990 के दशक हो चुकी थी। माओवादी गोंदिया के विदरभा जीला, चन्द्रपुर और गादचिरोली में काफी सक्रिय थे। 2020 में करीबन 500 माओवादी ने खुद को पुलिस के सामने सरेंडर किया।

बिहार

बिहार, जहाँ माओवादीयों का जमकर बोलबाला था। बिहार और नेपाल से लगे सीमाओं में माओवादीयों ने काफी समय तक राज किया। बिहार में माओवादीयों की हार का कारण अपने ही बनाये हुए जाति भेद के कारण और नीतिश सरकार के निकाले गए schemes के वजह से होने लगी। वर्तमान समय में माओवादी का वर्चस्व केवल गया एवं इसके आस-पास के जिलों तक ही सीमित रह चुका है।

नक्सलों या माओवादी द्वारा किया गया हमला

अबतक माओवादीयों ने कई हमले किए और इनमें कई जवान घायल हुए एवं कई मारे भी गए। यही नहीं हमले में अनेकों माओवादी भी पकङे  एवं मारे जा चुके है। अभी कुछ दिन पहले माओवादी ने छत्तीसगढ के बीजपुर जिलें में आतंकी हमले किए जिसमें कई जवान मारे गए, उनमे से एक जवान को माओवादीयों ने बंधक भी बना रखा था और बाद में छोङ भी दिया। इसके अलावा माओवादीयों ने-

2013 में सुकमा जिले में कांग्रेस के एक नेता समेत 27 लोगो की हत्या की थी।

2012 में झारखणड में बरिगवां जंगल में कई पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी थी।

2011 में छत्तीसगढ के दान्तेवाडा में नक्सली हमले में 76 जवान शहीद हुए थे।

2010 में पश्चिम बंगाल में सिल्दा कैंप में घुसकर माओवादीयों ने हमले कर दिया जिसमें कई सैनिक मारे गये। इसी समय कोलकाता-मुम्बई ट्रेन में माओवादीयों मे घुसकर कई passengers को मार दिया।

2009 में महाराष्ट्र के गढचिरौली में नक्सलियों ने हमला किया जिसमें CRPF के कई जवान मारे गये।

2008 में माओवादीयों ने उङिसा में 14 पुलिसकर्मीयों और एक युवक की हत्या कर दी थी।

2007 में छत्तीसगढ के बस्तर में माओवादीयों ने 55 पुलिसकर्मीयों को मार गिराया था। 

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