Health care system

Corona Effect: महामारी ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की खोली पोल

कोरोना भारत राजनीति

कोरोना की दूसरी लहर ने देश भर में त्राहिमाम मचा दिया है। हालात बद से बदतर होते जा रहे है। कोरोना का ब्रेक फेल है और सिस्टम पूरी तरह से चरमरा गई है। सियासत की खिचतान जारी है, कोई चुनाव में मस्त है तो कोई धर्म पर आर-पार करने को तैयार है। लेकिन मर रही है तो सिर्फ इंसानियत, बढ़ रही है तो सिर्फ श्मशान और कब्रिस्तान में भीड़। इस महामारी ने किसी को नहीं बख्शा, कोई भी राज्य हो, किसी की भी सरकार हो, सब के दावों की पोल खोल कर रख दी है। हर राज्य की स्वास्थ्य सेवाएं राम भरोसे है। महाराष्ट्र हो या मध्य प्रदेश, दिल्ली हो या यूपी, छतीसगढ हो या बिहार हर जगह से एक जैसी ही तस्वीर सामने आ रही है। अस्पतालों से लेकर श्मशान तक हर जगह कतारें ही कतारें नजर आ रही है। पिछले साल जब पहली बार कोरोना वायरस ने दस्तक दी थी तो हम उससे अंजान थे और लड़खड़ाते हुए ये सीख रहे थे कि ये बीमारी आखिर है क्या, किस तरह से इसे बचा जाए और कैसे निपटा जाए? लेकिन कोरोना का दूसरा वेव जो आया है, बताया जा रहा है कि वो पहले से भी कहीं ज्यादा संक्रामक और खतरनाक है। ऐसे में जो पहले वेव के दौरान ये दावे किए जा रहे थे कि पूरी व्यवस्था को दुरुस्त किया जा रहा है। स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने के जो बड़े-बड़े दावे किए गए थे वो अब सारे दावे हवा-हवाई ही साबित हो रहे हैं। कहीं बेड नहीं, कहीं ऑक्सीजन नहीं, कहीं डॉक्टर नहीं मिल रहे तो कहीं दवाई नहीं। आजाद हिदुस्तान में ऐसा मंजर शायद ही कभी देखा गया हो। अस्पताल अपनी मजबूरियां बता रहे हैं, सरकारें अपने दावे कर रही है लेकिन सच्चाई ये है कि हाहाकार मचा हुआ है और जगह-जगह भयानक हालत है।

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आम लोगों की कौन कहे, सरकार के मंत्री भी इस सिस्टम के खिलाफ सवाल उठा रहे हैं। हाल ही में यूपी के कानून मंत्री बृजेश पाठक ने प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर अपर मुख्य सचिव स्वास्थ्य और प्रमुख सचिव को एक चिट्ठी लिखी थी, जिसमें उन्होंने साफ कहा था कि लोगों को सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। ना एंबुलेंस समय पर मिलती है और भर्ती होने में 2-2 दिन का समय लग रहा है। बृजेश पाठक ने जांच पर भी सवाल उठाया। उधर, गुजरात हाई कोर्ट ने भी वहां की सरकार के लिए टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा था कि लोगों का भरोसा उठ रहा है, लोगों को लगने लगा है कि अब वो भगवान भरोसे हैं। ऐसा लगता है मानो पूरा सिस्टम ही धराशाई हो गया हो। पहली लहर में जिन तैयारियों के बड़े-बड़े दावे किए गए, वो तैयारियां दूसरी लहर में कहा डूब गई ये कोई ऩहीं बता पा रहा है। दिल्ली में भी लोग भटक रहे हैं। यही वजह है कि दिल्ली में 14 प्रइवेट अस्पतालों को सिर्फ कोविड के इलाज के लिए कहा गया है, जबकि चार सरकारी हॉस्पिटल को भी पूरी तरह कोविड कर दिया गया है। लेकिन फिर भी बेड की मारामारी खत्म नहीं हो रही। महाराष्ट्र का तो बुरा हाल है, सबसे ज्यादा अगर कोरोना ने किसी राज्य को तबाह किया है तो वो महाराष्ट्र ही है। राज्य के कई जिलों में बेड्स की कमी है, तो कुछ जगह वैक्सीनेसन के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। बढ़ते संकट और मिनी लॉकडाउन के कारण राज्य से हजारों की संख्या में मजदूर एक बार फिर पलायन करने को मजबूर हैं। ऐसा ही हाल राजस्थान का है, यहां पर भी वैक्सीन की किल्लत है, रेमडेसिविर के इंजेक्शन की कालाबाजारी हो रही है और नए केस, मौतें हर दिन रिकॉर्ड बना रही हैं। उधर, मध्य प्रदेश में कोरोना से मरने वालों की संख्या को ही सरकार छिपाने में लगी है तो वहीं छत्तीसगढ़ में तो शवों को कूड़े की गाड़ी में भड़कर ले जाने का मामला सामने आया है। यानी कोरोना मरीजों को न मरने से पहले चेन ना मरने के बाद सुकून हैं।


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झारखंड में सिस्टम ने तोड़ा दम

झारखंड में कोरोना के कारण हालात बदतर हो चुके हैं, राजधानी रांची के एक अस्पताल से ऐसी तस्वीर आई कि इसने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है। एक बेटी की चीख सरकार के कानों तक नहीं पहुंची। सदर अस्पताल में तड़पते पिता को बचाने के लिए एक बेटी की तड़प पत्थर दिल को रुला गई, लेकिन सिस्टम नहीं पिघला, यहां ना डॉक्टर मिले और ना इलाज जिसके बाद लड़की के पिता ने दम तोड़ दिया। ये सब तब हुआ, जब स्वास्थ्य मंत्री खुद अस्पताल में थे।

प्रोटोकॉल ने ली कोरोना मरीज की जान

बिहार में तो संवेदनहीनता की हद हो गई। जिस वक्त बिहार के स्वास्थ्य मंत्री NMCH का निरीक्षण कर रहे थे उसी वक्त उसी अस्पताल के बाहर एक कोरोना पीड़ित पूर्व फौजी ने दम तोड़ दिया। क्योंकि NMCH के अंदर राज्य के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय का स्वागत होना जरुरी था। कोरोना पीड़ित पूर्व फौजी अस्पताल के बाहर एम्बुलेंस में घंटों कड़ी धूप में पड़े रहे। बेटा डॉक्टरों से अस्पताल में भर्ती करने के लिए गुहार लगाता रहा। लेकिन किसी डॉक्टर को फुर्सत नहीं मिली कि वे मरीज को देख पाते।

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हर कोई अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहा है। सवाल उठ रहा है कि ये हालात आखिर आए कैसे? क्या कोरोना के मामले घटने के बाद सरकारें बेफिक्र हो गई थीं? आखिर कोरोना का पहला फेज देखने के बाद भी क्यों नहीं अस्पतालों में इतेजाम किए गए? क्यों देश को कोरोना के आग में झोंक दिया गया? अभी तो दूसरी लहर का आगाज हुआ है, आकड़े बढ़ने शुरू हुए है, सिस्टम चरमराना शुरू हुआ है। ये हालात कहां तक जाएंगे कल्पना करके भी रूह कांप जाती है। क्योंकि यहां सब कुछ भगवान भरोसे है। हेल्थ सिस्टम जैसा कुछ भी नजर नहीं आ रहा है। कोरोना के खिलाफ लड़ाई जैसा कुछ भी नहीं दिख रहा। जुबान से दावे जो भी किए जा रहे हो लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि सब कुछ सरेंडर मोड पर है। सिस्टम पूरी तरह से फैल हो चुका है।

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